कांग्रेस के लोग मानसिक व वैचारिक असंतुलन का जब-तब बेहूदा प्रदर्शन कर रहे : भाजपा

Congress people are displaying their mental and ideological imbalance every now and then: BJP

भाजपा प्रदेश प्रवक्ता व पूर्व मंत्री मूणत ने कांग्रेस को आईना दिखाया और कहा : वीर सावरकर और रास्वसं को लेकर अशोभनीय टिप्पणियाँ करके कांग्रेस ऐतिहासिक तथ्यों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को झुठला रही

कांग्रेस के पुरखों ने जिन ऐतिहासिक तथ्य व सत्य से देश को वंचित रखा, एक परिवार की भक्ति में मशगूल उन कांग्रेस के नेताओं को किसी के प्रति बेहूदगीभरी टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है

रायपुर(media saheb.com) ।भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता व पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वातंत्र्यवीर सावरकर को लेकर कांग्रेस नेताओं द्वारा की जा रही टिप्पणियों को उनकी इतिहास के बारे में तथ्यात्मक अज्ञानता का परिचायक बताते हुए कहा कि केंद्र सें सत्ता से बेदख़ली से विचलित और छत्तीसगढ़ में भारी बहुमत के कारण राजनीतिक बदहज़मी से त्रस्त कांग्रेस के लोग मानसिक व वैचारिक असंतुलन का जब-तब बेहूदा प्रदर्शन करते रहते हैं। श्री मूणत ने कहा कि वीर सावरकर और रास्वसं को लेकर अशोभनीय टिप्पणियाँ करके कांग्रेस के लोग भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम के ऐतिहासिक तथ्यों और रास्वसं के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को झुठलाने का निंदनीय व अक्षम्य कृत्य कर रहे हैं।

भाजपा प्रदेश प्रवक्ता व पूर्व मंत्री श्री मूणत ने कहा कि जिस राजनीतिक दल का अपना इतिहास और चरित्र ही विदेशियों की दासता में सियासत करने का रहा है, उस राजनीतिक दल के लोग मिथ्याचारी वामपंथियों के स्क्रिप्ट राइटर्स के इशारों पर भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम के नायकों और राष्ट्रभक्त संगठन को सर्टीफ़िकेट देने की हास्यास्पद कोशिश कर रहे हैं। श्री मूणत ने कहा कि राजनीति में अपने बचकानेपन की पराकाष्ठा करते कांग्रेस नेताओं को पहले अपना इतिहास खंगालने की ज़्यादा ज़रूरत है। एक अंग्रेज़ अफ़सर ह्यूम ने 1885 में कांग्रेस की स्थापना 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उपजे भारतीय आक्रोश के मद्देनज़र एक ‘सेफ़्टी वॉल्व’ के तौर पर की थी। बाद में भी इसी कांग्रेस के लगभग आधा दर्ज़न अध्यक्ष अंग्रेज़ ही रहे। श्री मूणत ने कहा कि कांग्रेस के लोग जब-तब रास्वसं, जनसंघ और भाजपा के लोगों के स्वाधीनता संग्राम में योगदान पर सवाल उठाते समय यह तथ्य क्यों भूल जाते हैं कि 1914  में प्रथम विश्वयुद्ध के समय तमाम बड़े कांग्रेस नेताओं ने भारतीय जनमानस की भावनाओं के विपरीत जाकर ब्रिटेन की तरफ़ से लड़ने के लिए सेना में भारतीयों की भर्ती कराई, जिसमें लगभग 40 हज़ार भारतीय सैनिक मारे गए और लगभग 60 हज़ार भारतीय सैनिक घायल हुए थे। तब भारत की अर्थव्यवस्था भी पूरी तरह चौपट हो गई थी। आज के कांग्रेस नेता अपने पुरखों की इस नाक़ामी पर मुँह में दही क्यों जमा लेते हैं?

भाजपा प्रदेश प्रवक्ता व पूर्व मंत्री श्री मूणत ने कहा कि दया याचिका बोल-बोलकर वीर सावरकर के यश और उनके बलिदान पर उंगली उठाते कांग्रेस के वैचारिक दुराग्रह की पराकाष्ठा यह है कि वे उस तथ्य से आँखें फेर लेते हैं, जो कांग्रेस नेताओं की मानसिकता को बेनक़ाब करने के लिए पर्याप्त है। प्रथम विश्व युद्ध के समय कांग्रेस नेता यह मानकर चल रहे थे कि ब्रिटेन की तरफ़ से युद्ध में भारत के सहयोग के बाद अंग्रेज़ हुक़्मरान ‘दया करके’ भारत को स्वतंत्रता न सही, स्वायत्तता तो दे ही देंगे। श्री मूणत ने कहा कि अंग्रेज़ों ने स्वायत्तता की दया करने के बज़ाय जलियाँवाला नरसंहार भारत को दिया और ‘दयापूर्वक स्वायत्तता’ के मुग़ालते में जी रहे तत्कालीन कांग्रेस नेताओं का अनुमान झूठा साबित हो गया। श्री मूणत ने कहा कि इस ऐतिहासिक तथ्य को भी वामपंथियों की रटी-रटाई स्क्रिप्ट पढ़ते समय कांग्रेस के लोग भूल जाते हैं कि सन 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने प्रथम स्वतंत्र भारत सरकार का गठन किया था जिसे विश्व के 11 अन्य देशों ने मान्यता तक दी। श्री मूणत के मुताबिक़ कांग्रेस नेता देश विभाजन के लिए मुस्लिम लीग को ज़िम्मेदार बताकर अपने पाप को ढँकने की कोशिश करते हैं जबकि यह एक स्थापित ऐतिहासिक सत्य है कि धर्म के आधार पर हुए देश विभाजन के बाद भी भारत व पाकिस्तान में हिन्दू-मुस्लिम आबादी लगभग बराबर ही रही है। अगर मुस्लिम लीग के कारण देश विभाजित होता तो सारे मुस्लिम पाकिस्तान चले जाने चाहिए थे।

भाजपा प्रदेश प्रवक्ता व पूर्व मंत्री श्री मूणत ने कहा कि देश का विभाजन सिर्फ़ एक ख़ानदान की सत्ता-लोलुपता का परिणाम थी। इस ऐतिहासिक सत्य को कभी झुठलाया नहीं जाना चाहिए कि देश का बँटवारा जवाहरलाल नेहरू के अहं और ईगो का नतीजा था। देश की आज़ादी के बाद भी देश के वीर सपूतों के प्रति भारत सरकार का रवैया एकांगी रहा। नेताजी सुभाष बाबू की खोज-ख़बर लेने तथा संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु के बारे में सच को सामने लाने में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने कोई रुचि नहीं दिखाई। श्री मूणत ने कहा कि इसी तरह 1966 में ताशकंद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की संदिग्ध मौत का सच सामने लाने में उनके बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी ने कोई प्रयास नहीं किया। कांग्रेस के पुरखों ने जिन ऐतिहासिक तथ्य व सत्य से देश को वंचित रखा, एक परिवार की भक्ति में मशगूल उन कांग्रेस के नेताओं को किसी की राष्ट्रभक्ति और देश के लिए किए गए बलिदान पर बेहूदगीभरी टिप्पणी करना न तो शोभा देता है और न ही उनको इसका कोई अधिकार है। वे बस अपने राजनीतिक चरित्र पर ध्यान केंद्रित रखें।

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